समाज के बदलाव से प्रभावित होता है सिनेमा का नायक : जावेद अख़्तर

समाज के बदलाव से प्रभावित होता है सिनेमा का नायक : जावेद अख़्तर

Ananya soch

अनन्य सोच। बॉलीवुड और सत्ता के रिश्तों पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन जावेद अख़्तर का जवाब हमेशा की तरह बेबाक, तार्किक और यथार्थ से जुड़ा हुआ है. जब उनसे पूछा गया कि हिंदी फ़िल्म उद्योग सत्ता से टकराने या उससे सवाल करने से क्यों बचता है, तो उन्होंने यह सवाल ही समाज के व्यापक ढांचे की ओर मोड़ दिया. उनका कहना था कि सिर्फ़ सिनेमा ही नहीं, कोई भी बड़ा उद्योग या प्रभावशाली टीवी चैनल सचमुच एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नहीं है. कला, सिनेमा और मीडिया समाज से अलग होकर नहीं बनते। जिस समाज में भय, दबाव और असुरक्षा का वातावरण हो, वहाँ खुलकर बोलना आसान नहीं होता. इसलिए अगर हम केवल सिनेमा को कटघरे में खड़ा करते हैं, तो यह पूरे समाज की सच्चाई से मुँह मोड़ने जैसा है. 

इतिहास और सत्ता की प्रकृति पर बात करते हुए जावेद अख़्तर ने बेहद अहम टिप्पणी की। उनका साफ़ कहना था कि कोई भी शासक वास्तव में कम्युनल नहीं होता. सत्ता का असली धर्म सिर्फ़ सत्ता ही होती है। जो विचारधारा उसकी सत्ता को मजबूत करती है, वही उसकी नीति और पहचान बन जाती है. ऐसे में किसी शासक को ‘कम्युनल’ कह देना दरअसल उसे ज़रूरत से ज़्यादा ईमानदार मान लेना है। सत्ता अपने हित के लिए विचारधाराओं का इस्तेमाल करती है, न कि उन्हें आत्मा से अपनाती है. 

कम्युनलिज़्म पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने इसे सामाजिक सोच की सबसे बड़ी भूल बताया. उनके अनुसार, किसी पूरे समुदाय को एक ही रंग में रंग देना समझदारी नहीं है। हर शहर, हर देश, हर धर्म और हर समाज में हर तरह के लोग होते हैं—अच्छे भी, बुरे भी, संवेदनशील भी और स्वार्थी भी। किसी व्यक्ति को उसकी पहचान के आधार पर आंकना अन्याय है; असली कसौटी उसके कर्म और उसका व्यवहार होना चाहिए. 

आज की भाषा, गीतों और सिनेमा के स्तर को लेकर होने वाली आलोचनाओं पर भी जावेद अख़्तर ने आत्ममंथन की ज़रूरत बताई। उनका कहना था कि सवाल यह नहीं है कि आज की रचनाएँ कमजोर क्यों हैं, बल्कि यह है कि क्या हमने अपनी नई पीढ़ी को भाषा, कविता और साहित्य से जोड़ने की कोई गंभीर कोशिश की है। अगर यह रिश्ता टूट गया है, तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ़ सिनेमा पर डालना अनुचित है. हर पीढ़ी को यह भ्रम रहता है कि उससे पहले का दौर बेहतर था, लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी ‘स्वर्ण युग’ कभी वर्तमान में नहीं होता. समय बदलता है, समाज बदलता है और कला भी उसी बदलाव के साथ अपना स्वरूप बदलती है. 

अपने निजी जीवन को याद करते हुए जावेद अख़्तर ने माँ से मिले संस्कारों को अपनी सोच की बुनियाद बताया. उनका कहना था कि उनकी माँ का साया उन्होंने बहुत कम उम्र में खो दिया था, लेकिन उनके सिखाए शब्द, भाषा की समझ, अदब और जीवन-मूल्य हमेशा उनके साथ रहे। उन्हें आज भी याद है कि उनकी माँ कहा करती थीं—बड़ों की बताई बातें दुनिया की किसी भी किताब से ज़्यादा क़ीमती होती हैं. स्कूल से लौटने के बाद वह उन्हें उस दिन पढ़ाए गए पाठ के साथ-साथ अगले अध्याय को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करती थीं। उनका विश्वास था कि घर और परिवार से मिले संस्कार ही जीवन भर व्यक्ति की सोच को आकार देते हैं. 

प्रगतिशील कवि पिता जाँनिसार अख़्तर, आधुनिक विचारों वाली लेखिका माँ सफ़िया अख़्तर और मामा मज़ाज़ जैसे रचनात्मक व्यक्तित्वों का साथ उन्हें विरासत में मिला. इन्हीं प्रभावों के कारण उनके विचारों में खुलापन आया और वह शुरू से ही कमजोर, वंचित और ग़रीब के प्रति संवेदनशील बने रहे. 

धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनका दृष्टिकोण बचपन से ही स्पष्ट रहा। उन्होंने कहा कि उनके घर में हर किसी को अपनी इच्छा से जीने का अधिकार था. मुंबई आने के बाद भी उनके ज़्यादातर साथी प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े रहे। उनके लिए प्रगतिशीलता का सीधा अर्थ ही धर्मनिरपेक्षता है। आम आदमी के बीच रहकर काम करना, उसकी समस्याओं को समझना और हर तरह की कट्टरता का विरोध करना ही उस आंदोलन की आत्मा रही है। इस वैचारिक माहौल का उनके लेखन पर भी गहरा असर पड़ा. 

जावेद अख़्तर ने प्रगतिशील साहित्य पर बात करते हुए कहा कि प्रगतिशील लेखकों में उन्हें कृष्ण चंदर विशेष रूप से प्रिय हैं. उनका मानना है कि कृष्ण चंदर का साहित्य सिर्फ़ विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदना, करुणा और जीवन की गहरी समझ से भरा हुआ है. 

उन्होंने कहा कि कृष्ण चंदर जिस सहजता से आम आदमी के दुख–दर्द, उसकी बेबसी और उसके संघर्ष को शब्द देते हैं, वह उन्हें हमेशा प्रभावित करता रहा है। उनकी कहानियों में कोई बनावट या उपदेशात्मकता नहीं, बल्कि जीवन की सच्ची तस्वीरें मिलती हैं. चाहे साम्प्रदायिकता का सवाल हो, ग़रीबी का यथार्थ हो या इंसान की आंतरिक पीड़ा—कृष्ण चंदर का लेखन हर स्तर पर संवेदनशील और ईमानदार दिखाई देता है. 

जावेद अख़्तर के अनुसार प्रगतिशील लेखक होने का अर्थ सिर्फ़ नारेबाज़ी नहीं, बल्कि आम इंसान के प्रति गहरी सहानुभूति और सामाजिक अन्याय के खिलाफ़ खामोश लेकिन मज़बूत प्रतिरोध है, और यही गुण उन्हें कृष्ण चंदर के साहित्य में सबसे अधिक दिखाई देता है. उनका लेखन उन्हें लगातार यह एहसास कराता रहा है कि साहित्य का असली धर्म सत्ता के करीब होना नहीं, बल्कि मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है. 

हिंदी सिनेमा में आए निरंतर परिवर्तनों पर बात करते हुए जावेद अख़्तर ने कहा कि सिनेमा समाज का आईना होता है. समाज में जो कुछ घटित होता है, वही किसी न किसी रूप में सिनेमा में दिखाई देता है. एक समय था जब फ़िल्मों का नायक किसान या मज़दूर होता था. फिर मध्यम वर्ग का आम आदमी सिनेमा के केंद्र में आया. इसके बाद व्यवस्था और सत्ता से टकराने वाला ‘एंग्री यंग मैन’ नायक बना. आज का नायक अपेक्षाकृत खुले विचारों वाला, आत्मसंतुष्ट और अपने सपनों में खोया हुआ युवक है। यह बदलाव सिनेमा का नहीं, समाज का प्रतिबिंब है, जो परदे पर दिखाई देता है. 

जावेद अख़्तर की ये बातें सिर्फ़ सिनेमा या साहित्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आज के समाज, राजनीति और सामूहिक सोच पर गहरी टिप्पणी हैं. उनकी दृष्टि हमें यह समझने में मदद करती है कि सत्ता, समाज और कला—तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन्हें अलग-अलग खानों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता.