मीरा के भजनों से सजी सुबह 

नवल पांडेय।

मीरा के भजनों से सजी सुबह 

Ananya soch

अनन्य सोच। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन की शुरुआत प्रातःकालीन मॉर्निंग म्यूज़िक सत्र के साथ हुई, जहाँ लोक-संवेदना और भक्ति-रस से सराबोर वातावरण ने पूरे परिसर को एक आध्यात्मिक अनुभव में बदल दिया. इस सत्र की केंद्रीय उपस्थिति रहीं राजस्थान की सुप्रसिद्ध लोक गायिका भंवरी देवी, जिनकी बुलंद, आत्मा को छू लेने वाली और परंपरा में रची-बसी आवाज़ ने श्रोताओं को लोक और भक्ति की एक जीवंत यात्रा पर ले गया. 

भंवरी देवी राजस्थान की उन विरल लोक कलाकारों में हैं जो भोपा–भोपी परंपरा और विशेष रूप से पाबूजी की फड़ कथाओं के सजीव गायन के लिए जानी जाती हैं. इस लोक परंपरा में कथा, संगीत और भक्ति का ऐसा समन्वय दिखाई देता है, जो वर्षों की साधना और अनुशासन से संभव हो पाता है. जीवन में आए गहरे व्यक्तिगत संकट—पति के असामयिक निधन—के बाद भंवरी देवी ने लोकगायन को ही अपनी शक्ति बनाया और अकेले अपनी आवाज़ के सहारे परिवार का पालन-पोषण किया. उनकी यह यात्रा लोक-संघर्ष, आत्मसम्मान और स्त्री-सशक्तीकरण का सशक्त उदाहरण बन चुकी है. 

भंवरी देवी ने न केवल देश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी राजस्थान की लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है. कोक स्टूडियो जैसे समकालीन मंचों पर उनकी उपस्थिति ने यह प्रमाणित किया कि लोकसंगीत किसी कालखंड में बँधा नहीं होता, वह तभी जीवित रहता है जब उसे सच्चाई और साधना के साथ प्रस्तुत किया जाए. 

आज की प्रस्तुति में उनके साथ गायक कृष्ण कुमार ने मंच साझा किया। दोनों कलाकारों के स्वर-संयोग ने प्रातःकालीन वातावरण को और अधिक संगीतमय बना दिया. इस दौरान भंवरी देवी ने पाबूजी के पारंपरिक भजनों के साथ मीरा के भजन और सतगुरु की वंदना प्रस्तुत की। “मंदिर जाती मीरा ने साँवरिया मिल गया रे”, “भजनां सूँ मीठी लागे मीरा मेवाड़ी राणा”, “हिंडो घलायो सरगरुसा हरिये बाग में”, “मोहन आओ तो सही” और “थाने कठे ढूँढबाँ जाऊँ रे साँवरियो घट माही” जैसे भजनों ने श्रोताओं को लोकभक्ति की उस आत्मीय दुनिया में पहुँचा दिया, जहाँ शब्दों से अधिक अनुभूति बोलती है. 

भंवरी देवी की गायिकी में लोक केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन बनकर उभरता है। उनकी आवाज़ में संघर्ष की आँच भी है और श्रद्धा की शीतलता भी. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का यह मॉर्निंग म्यूज़िक सत्र एक प्रस्तुति भर नहीं, बल्कि उस लोकचेतना का उत्सव बन गया, जो पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही जीवंत और प्रभावशाली है.