आज प्रकृति से फिर रिश्ता जोड़ने की ज़रूरत है : हरिराम मीणा

नवल पांडेय।

आज प्रकृति से फिर रिश्ता जोड़ने की ज़रूरत है : हरिराम मीणा

Ananya soch

अनन्य सोच। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतर्गत आयोजित “जन, जंगल और ज़मीन” सत्र में प्रमुख आदिवासी चिंतक और दलित विचारक डॉ. हरिराम मीणा ने कहा कि आज विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का जिस तरह अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, वह जंगल और ज़मीन के पारिस्थितिकीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है. उन्होंने कहा कि यह कोई तात्कालिक या सीमित विषय नहीं, बल्कि एक सर्वकालिक और सार्वजनिक चिंता का मुद्दा है, जिसका असर केवल मनुष्य पर ही नहीं, बल्कि सभी जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर पड़ रहा है. 

इस सत्र में युवा कवि और लेखक विजय राही के साथ देवयानी ने संवाद किया। चर्चा के दौरान डॉ. हरिराम मीणा ने अरावली पर्वतमाला के महत्व पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि अरावली दुनिया की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से एक है, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात से होकर गुज़रती है. उन्होंने कहा कि अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि एक विशाल प्राकृतिक धरोहर है, जिसे संरक्षित किया जाना बेहद ज़रूरी है. 

उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि मनुष्य, जो स्वयं धरती पर केवल दो लाख साल पुरानी प्रजाति है, आज दो अरब साल पुरानी भौगोलिक संरचनाओं को नष्ट करने पर आमादा है. उन्होंने सवाल उठाया कि कोई भी व्यवस्था या सिस्टम किस अधिकार से किसी प्राकृतिक पर्वतमाला को अपने हिसाब से परिभाषित या वर्गीकृत कर सकता है. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर जनता और मीडिया को खुलकर आवाज़ उठानी चाहिए, क्योंकि यह केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का सवाल है. आज विकास, पर्यटन और खनन के नाम पर पहाड़ियों को डायनामाइट से उड़ाया जा रहा है, जो प्रकृति के साथ सीधा अन्याय है. 

डॉ. हरिराम मीणा ने सामाजिक और आर्थिक विषमता पर भी चिंता जताते हुए कहा कि हमारे देश में धर्म, अर्थ, काम, ज्ञान, शिक्षा और सत्ता पर एक छोटा वर्चस्ववादी वर्ग काबिज़ है, जबकि श्रमिक, मज़दूर, किसान और कामगार जैसे विशाल समुदाय आज भी मूलभूत भौतिक सुविधाओं से वंचित हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि बड़े-बड़े एक्सप्रेस हाईवे, पुल, एयरपोर्ट और गोदाम आखिर किसके लिए बनाए जा रहे हैं. जिन किसानों की ज़मीन पर ये परियोजनाएँ खड़ी की जा रही हैं, उन्हें बदले में क्या मिला? अधिकांश किसान और मज़दूर जीवन भर मजदूरी करते रह जाते हैं, जबकि विकास का लाभ कहीं और केंद्रित हो जाता है. 

संवाद में भाग लेते हुए युवा कवि और लेखक विजय राही ने कहा कि आज भी सुविधाओं के अभाव में गाँवों से शहरों की ओर पलायन लगातार जारी है. उन्होंने कहा कि पहले ग्रामीण और आदिवासी समाज के जलस्रोतों पर हमला हुआ, फिर उनके पहाड़ों को खोद डाला गया। आज़ादी के बाद आदिवासियों को उम्मीद थी कि गाँवों में भी खुशहाली आएगी, लेकिन विकास परियोजनाओं के नाम पर उनके हिस्से में अधिकतर विस्थापन ही आया. 

विजय राही ने कहा कि अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उसने आदमी के भीतर सोए उस आदिवासी को जगा दिया है, जो प्रकृति से प्रेम करता है. उन्होंने कहा कि इस सुंदर प्रकृति को बचाना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है. लेखक अपनी रचना में तो प्रकृति को सहेज सकता है, लेकिन धरातल पर उसे बचाने के लिए समाज के हर वर्ग को मिलकर आगे आना होगा. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि बारूद के विस्फोट से भले ही प्रकृति पर अस्थायी विजय हासिल कर ली जाए, लेकिन अंततः प्रकृति स्वयं ही ऐसे विनाशकारी कृत्यों को ध्वस्त कर देती है. 

इस अवसर पर विजय राही ने अरावली पर लिखी अपनी चर्चित कविता
“तुम्हारी गोद में गुज़रा है जीवन हमारे पुरखों का”
भी सुनाई, जिसे श्रोताओं ने गहरी संवेदना और सराहना के साथ सुना.