जीवन के छन्द और लय को जोड़ती है संस्कृत- राधावल्लभ त्रिपाठी
नवल शर्मा
Ananya soch
अनन्य सोच। आज के समय में जब जीवन की गति के साथ-साथ हमारी दिनचर्या, संबंध और संवेदनाएँ भी लगातार अव्यवस्थित होती जा रही हैं, ऐसे दौर में भाषा का संतुलन और उसकी लय पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. इसी संदर्भ में देश के शीर्षस्थ संस्कृत विद्वान आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने गहन और विचारोत्तेजक बात रखी. उनका कहना था कि जब हमारे जीवन से ही छंद और लय टूट रहे हों, तब कम से कम हमारी भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसमें लय, छंद और अनुशासन बना रहे. इसके लिए आवश्यक है कि आज का युवा संस्कृत से जुड़े, क्योंकि संस्कृत को जानना वस्तुतः संस्कृति को जानना है. आचार्य त्रिपाठी के अनुसार संस्कृत साहित्य केवल एक प्राचीन भाषा का संग्रह नहीं है, बल्कि भारतीय जीवन और सांस्कृतिक चेतना का आधारस्तंभ है. संस्कृत के इस समृद्ध साहित्य में भारत की आत्मा सांस लेती हुई महसूस होती है। इसलिए युवाओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस भाषा में भी ज्ञान अर्जित करें. उनका यह भी मानना था कि आज का युवा जितनी अधिक भाषाएँ सीखता है, उतना ही उसके भीतर बेहतर इंसान बनने की संभावनाएँ खुलती हैं. भाषाएँ हमें यह प्रेरणा देती हैं कि हम अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव कैसे ला सकते हैं. यह विचार उन्होंने “प्री मॉडर्न इंडिया में संस्कृत पंडित” विषय पर डॉ. रेणुका राठौड़ के साथ संवाद के दौरान व्यक्त किए. इस चर्चा में उन्होंने भारतीय समाज के निर्माण में पंडितों की ऐतिहासिक और वैचारिक भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया. पंडित की परिभाषा स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति विषम और सम दोनों परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखे, सबको समदृष्टि से देखे और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर विचार करे, वही सच्चे अर्थों में पंडित कहलाता है. उनके शब्दों में, “शास्त्रों की सीढ़ियों पर चढ़कर प्रज्ञा के चरम प्रासाद पर पवित्र भाव से पहुँचने वाला ही सच्चा पंडित है.”
उन्होंने प्राचीन भारतीय समाज की संरचना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय गाँव स्वावलंबी होते थे और उनकी अपनी आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था होती थी. प्रत्येक गाँव में संस्कृत की पाठशाला होती थी और वहाँ एक पंडित बच्चों को शास्त्रों, ग्रंथों और जीवन-मूल्यों की शिक्षा देता था. लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान, मैकाले की शिक्षा नीति के लागू होने के बाद सबसे पहले इन्हीं पाठशालाओं को बंद कराया गया। इसके पीछे उनका उद्देश्य स्पष्ट था—यदि भारतीय बच्चे अपनी संस्कृति और परंपरा को जान लेंगे, तो उन पर शासन करना आसान नहीं रहेगा. आचार्य त्रिपाठी ने यह भी कहा कि अंग्रेज़ों ने बड़ी चतुराई से ‘पंडित’ शब्द की सामाजिक परिभाषा को ही विकृत कर दिया. पंडित को केवल चोटी रखने वाला, धोती-कुर्ता पहनने वाला और तिलक लगाने वाला व्यक्ति मानकर उसकी बौद्धिक और नैतिक भूमिका को सीमित कर दिया गया, जबकि वास्तविक पंडित वह होता है जो ज्ञान, विवेक और समदृष्टि से समाज का मार्गदर्शन करे. संस्कृत के सर्वसमावेशी स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि ईसाई और मुस्लिम समुदाय के अनेक विद्वानों ने भी संस्कृत में गहन अध्ययन किया और उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक ग्रंथों की रचना की. उन्होंने विशेष रूप से वारेन हेस्टिंग्स का उल्लेख किया, जो स्वयं एक बड़े संस्कृत प्रेमी थे. हेस्टिंग्स ने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्मृति ग्रंथों के आधार पर पहली बार ‘हिंदू लॉ’ का एक विस्तृत एनसाइक्लोपीडिया तैयार करवाया. इस कार्य के लिए उन्होंने पचास पंडितों का चयन किया, जिन्होंने विभिन्न स्मृतियों के आधार पर पचास लॉ बुक्स का निर्माण किया. इसके अतिरिक्त उन्होंने संस्कृत में योगदान देने वाले अन्य ईसाई विद्वानों—जॉन म्यूर, विलियम जॉन्स, चार्ल्स विल्किंस, सोलोमन, केटलर आदि—को भी स्मरण किया. मुस्लिम विद्वानों के योगदान पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि अकबर के शासनकाल में अनेक संस्कृत ग्रंथों के फ़ारसी अनुवाद हुए. दाराशिकोह ने भी उपनिषदों सहित कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का अनुवाद कराया. बीसवीं शताब्दी में पंडित विराज़दार ग़ुलाम दस्तग़ीर, सैयद हुसैन शास्त्री और अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना जैसे विद्वानों ने संस्कृत ग्रंथों का संकलन कर उन्हें हिंदी में अनूदित किया, जिससे यह ज्ञान व्यापक समाज तक पहुँच सका. संस्कृत साहित्य में स्त्रियों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए आचार्य त्रिपाठी ने स्वीकार किया कि समूचे संस्कृत साहित्य पर पुरुष वर्चस्व रहा है, इसके बावजूद कुछ ऐसी विदुषियाँ रही हैं जिनके योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. उन्होंने गार्गी, मैत्रेयी, ज्ञानसुन्दरी, आनंदमयी, राजम्मा, रमाबाई पंडित और क्षमाराव जैसी विदुषियों का नाम लेते हुए कहा कि इन महिलाओं ने अपने ज्ञान और चिंतन से संस्कृत परंपरा को समृद्ध किया है. कुल मिलाकर आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी का यह संवाद न सिर्फ़ संस्कृत भाषा और साहित्य की महत्ता को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि संस्कृत किसी एक समुदाय या काल की भाषा नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत है, जिससे जुड़कर आज की पीढ़ी अपनी जड़ों को समझ सकती है और भविष्य के लिए एक अधिक संतुलित दृष्टि विकसित कर सकती है.