खलनायक या मजबूर पात्र? "शकुनि" नाटक ने महाभारत के सबसे विवादित किरदार को दी बिल्कुल नई पहचान
क्या शकुनि सिर्फ एक धूर्त षड्यंत्रकारी था, या उसके पीछे छिपी थीं कुछ ऐसी परिस्थितियां जिन्होंने उसे वो बना दिया जो वह बना? जयपुर के एक मंच पर रविवार को इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की गई, जिसने दर्शकों को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया।
अनन्य सोच । राजस्थान अंतरराष्ट्रीय केंद्र (Rajasthan International Centre) के मुख्य सभागार में रविवार को नाटक "शकुनि" (Shakuni) का मंचन किया गया। दौलत वैद द्वारा परिकल्पित और निर्देशित इस प्रस्तुति में महाभारत (Mahabharata) के चर्चित पात्र शकुनि की कहानी को बिल्कुल अलग नजरिए से पेश किया गया।
युद्ध के बाद के पल से शुरू होती है कहानी
नाटक की शुरुआत महाभारत युद्ध के समापन के बाद होती है, जब वृद्ध शकुनि अपने हाथों में वही पासे लिए खड़ा है, जिन्होंने उसकी पूरी जिंदगी की दिशा तय की। इसके बाद कहानी धीरे-धीरे उसके अतीत, टूटे रिश्तों और उन घटनाओं की ओर बढ़ती है, जिन्होंने उसके व्यक्तित्व को गढ़ा।
सिर्फ खलनायक नहीं, इंसान के तौर पर दिखाया गया शकुनि
इस नाटक की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि शकुनि को महज एक चालाक रणनीतिकार या षड्यंत्रकारी के रूप में पेश नहीं किया गया, बल्कि उसके जीवन की परिस्थितियों और फैसलों को भी उतनी ही संवेदनशीलता से दर्शाया गया।
पासों ने निभाई प्रतीकात्मक भूमिका
मंच पर मौजूद पासे पूरे नाटक में एक अहम प्रतीक (Symbol) बने रहे, जो शकुनि के जीवन के फैसलों, भाग्य और उनके परिणामों को दर्शाते रहे। इसके जरिए दर्शकों को शकुनि के चरित्र को नए सिरे से समझने का मौका मिला।
विश्वासघात और महत्वाकांक्षा जैसे विषयों पर गहरी पकड़
नाटक में परिवार, रिश्ते, बदला, विश्वासघात और महत्वाकांक्षा जैसे संवेदनशील विषयों को भी बारीकी से छुआ गया। प्रस्तुति ने यह अहम सवाल भी उठाया कि किसी व्यक्ति को केवल उसके फैसलों से आंका जाए या उन हालातों को भी समझा जाए जिन्होंने उसके निर्णयों को प्रभावित किया।
दर्शकों ने की भरपूर सराहना
नाटक को दर्शकों से शानदार प्रतिक्रिया मिली। लोगों ने कहानी, संवाद, अभिनय और शकुनि के किरदार को पेश करने के अनोखे अंदाज को खुले दिल से सराहा। यह आयोजन RIC के नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा था, जो जयपुरवासियों को रंगमंच और भारतीय संस्कृति से जोड़ता रहता है।