नाटक बगिया बांछाराम की' का मंचन

अनन्य सोच, जयपुर। बगिया बांछाराम की' नाटक का मंचन रवींद्र मंच पर हुआ। प्रस्तुत नाटक एक गरीब वृद्ध किसान बांछाराम की धरती के प्रति प्रेम और संघर्ष की कहानी है। बांछाराम ने उम्र भर मेहनत करके अपनी बगिया को संजोये रखा है। वह महज आजीविका के लिए पेड़-पौधे नहीं उगाता, अपितु धरती के प्रति श्रद्धा व प्रेम उसकी मेहनत के मूल में छिपी है। इस हरे-भरे बाग को कई लोग हड़पना चाहते हैं। गांव का पूर्व ज़मींदार छैकोड़ी इसी बाग की आस मन में लिए मर गया और अब भूत बनकर इसी बाग में रहता है। उसका बेटा नौकोड़ी अपने सहयोगी मुख्तार के साथ बगीचे को हथियाने की नित नयी साजिश रचता है। उसने बांछा को बहला-फुसला कर उससे एक इकरारनामा भी करा लिया, जिसके तहत बांछा का बाग उसकी मृत्यु के बाद नौकोड़ी का होगा। एवज में प्रतिमाह कुछ रूपये बांछा को जीवित रहने तक मिलते रहेंगे। नौकोड़ी के अलावा बांछा का एकमात्र वारिस गोपी भी बाग को हथियाना चाहता है। वह इस जमीन को बेचकर बिजनेस करना चाहता है। गांव के चोर उचक्के भी बाग से चोरी करके अपना पेट पालते हैं। इस नाटक में जहाँ एक ओर बांछा के प्रकृति प्रेम व जीने की इच्छा-शक्ति का चित्रण है, तो दूसरी ओर सामंतवादी दुष्चक्रों व धरती को व्यापार का साधन बनाने की मानसिकता व उपभोगवादी संस्कृति भी परिलक्षित होती है।