मृदंग और घटम की मधुर जुगलबंदी 

नवल शर्मा।

Jan 15, 2026 - 22:39
Jan 16, 2026 - 17:57
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मृदंग और घटम की मधुर जुगलबंदी 

Ananya soch

अनन्य सोच। सुबह की ठंडी, अलसाई-सी हवा में जब मृदंग और घटम की थाप घुली, तो जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल (जेएलएफ) के पहले दिन की शुरुआत अपने-आप में एक स्मरणीय अनुभव बन गई. फ़्रंट लॉन में उगते सूरज की हल्की आभा के बीच कर्नाटक संगीत की मधुर स्वर-लहरियाँ वातावरण को किसी ध्यानस्थ क्षण में बदलती चली गईं. शास्त्रीय संगीत समूह “नाद : बीटवीन साउंड एंड साइलेंसेज” की यह प्रस्तुति केवल एक संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि ध्वनि और मौन के बीच रचे गए सूक्ष्म संवाद की तरह थी. 

इस समूह में गायक ऐश्वर्या विद्या रघुनाथ और ऋत्विक राजा ने अपनी सधी हुई गायकी और गहरी राग-समझ से श्रोताओं को शुरू से अंत तक बाँधे रखा. कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति महान संगीतकार मुदूरस्वामी दीक्षितर की 250वीं जयंती को समर्पित थी। इस अवसर पर उनकी अमर रचना “राम राम कली कलुष” प्रस्तुत की गई, जो रामकली राग में निबद्ध है। रचना की गंभीरता और आध्यात्मिकता ने सुबह के उस शांत क्षण को एक तरह की भक्तिमय एकाग्रता में बदल दिया. 

इसके बाद तमिल के विख्यात साहित्यकार भारतीदासन की प्रसिद्ध कविता “नू लाई पढ़ी” (किताब को पढ़ो) को स्वरबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया। राग लखाना में कम्पोज़ की गई इस प्रस्तुति में शब्दों और स्वर का ऐसा संतुलन दिखा कि संगीत ज्ञान और पढ़ने की प्रेरणा का माध्यम बन गया। श्रोताओं को लगा मानो संगीत स्वयं शिक्षा और बौद्धिक चेतना का आह्वान कर रहा हो. 

अगली प्रस्तुति में राग कमास में त्यागराज की रचना, जिसे श्यामशास्त्री द्वारा कम्पोज़ किया गया — “सीतापते ना मनसुना” — प्रस्तुत की गई। इस रचना में मृदंग और घटम की सुरीली जुगलबंदी विशेष आकर्षण का केंद्र रही. ताल वाद्यों की सधी हुई थाप ने न केवल गायकी को उभार दिया, बल्कि पूरे वातावरण को गहरी भक्ति और उल्लास से भर दिया. 

कार्यक्रम का समापन एक विचारप्रधान और अर्थगर्भित रचना से हुआ. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के प्रसिद्ध वक्तव्य “इल्म का सही घर है क़ुतुबखाना” से प्रेरित गोपाल कृष्ण गांधी की कविता — “किताब इल्म का निवास है, किताब ज्ञान का घर है” — को स्वरबद्ध कर प्रस्तुत किया गया। संगीत और विचार के इस सुंदर संगम ने श्रोताओं को यह महसूस कराया कि कला केवल रस की अनुभूति नहीं कराती, बल्कि चेतना और विवेक को भी विस्तृत करती है. 

इस प्रकार जेएलएफ के पहले दिन की यह सुबह कर्नाटक संगीत की गरिमा, ताल-लय की जुगलबंदी और ज्ञान-चेतना से जुड़ी रचनाओं के माध्यम से एक यादगार शुरुआत बन गई, जो देर तक मन और स्मृति में गूँजती रही.