Saurabh Shukla Interview: "पैसा ही सब कुछ नहीं, Theatre देता है अपनी शर्तों पर काम करने की आजादी"
जयपुर में नाटक 'बर्फ' के मंचन से पहले Saurabh Shukla ने Theatre, Acting और Career पर खुलकर बात की। जानिए उन्होंने Film और Theatre के फर्क पर क्या कहा।
अनन्य सोच । फिल्म और थिएटर के दिग्गज कलाकार Saurabh Shukla राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में हाल ही में हुए नाटक 'बर्फ' के मंचन के लिए जयपुर पहुंचे। 'सत्या' के कल्लू मामा और 'जॉली एलएलबी' के जज सुंदरलाल त्रिपाठी जैसे किरदारों से पहचान बनाने वाले शुक्ला ने राजस्थान पत्रिका से बातचीत में अपने सफर और थिएटर के अनुभव साझा किए। पेश हैं उस बातचीत के अंश।
Career: कई रास्तों से गुजरकर बने Actor
आप Acting में कैसे आए, क्या यह शुरू से तय था?
सौरभ शुक्ला: बिल्कुल नहीं। मेरा लक्ष्य कभी अभिनेता बनना नहीं था। मैंने क्रिकेटर बनने का सपना देखा, टेबल टेनिस खेला, संगीत और पेंटिंग आजमाई और Commerce भी पढ़ी। मगर कोई राह मंजिल तक नहीं ले गई। ज़रूरी नहीं कि हर किसी को जवानी में ही अपनी दिशा पता चल जाए। बहुत लोग 30 की उम्र तक खुद को समझ रहे होते हैं। Commerce में तो आखिरी साल तक मुझे डेबिट-क्रेडिट ही समझ नहीं आया।
Theatre की आजादी और पैसे का सवाल
Film से कम कमाई के बावजूद Theatre क्यों?
सौरभ शुक्ला: मेरे लिए पैसा जीवन का अंतिम मकसद नहीं है। मैं खुशनसीब हूं कि तीन महीने Films से दूर रहकर नाटक कर सकता हूं। Theatre अपनी शर्तों पर काम करने और प्रयोग करने की छूट देता है। यही आजादी मेरे लिए सबसे कीमती है।
Theatre और Film में असली फर्क
दोनों माध्यमों में काम करने का सबसे बड़ा अंतर क्या है?
सौरभ शुक्ला: Theatre में समय और प्रयोग की गुंजाइश होती है। Rehearsal में बदलाव कर सकते हैं और दृश्य को बार-बार निखार सकते हैं। Film में निर्माता का पैसा लगा होता है, इसलिए हर पल की कीमत है। फिर भी यह कहना गलत होगा कि Theatre से आया कलाकार ही बेहतर होता है। दोनों जगह औसत और प्रतिभाशाली, दोनों तरह के लोग हैं।
आज के Indian Cinema में Talent, चेहरा या Source, क्या सबसे ज्यादा मायने रखता है?
सौरभ शुक्ला: Cinema समय के साथ बदला है, पर Talent की अहमियत आज भी उतनी ही है। कई कलाकारों ने सिर्फ अपनी प्रतिभा के बल पर अलग पहचान बनाई है।