Jaipur Literature Festival: किताब पढ़ी जाने से अधिक सोची जाने वाली बात है-पवन के वर्मा
नवल पांडेय।
Ananya soch: Jaipur Literature Festival
अनन्य सोच। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के फ़्रंट लॉन में आज आयोजित सत्र में लेखक और विचारक पवन के वर्मा ने अपनी नई किताब The Lady Who Carried the Monk Across the River पर बात की. इस अवसर पर उनसे संवाद किया लेखिका किश्वर देसाई ने. यह सत्र महज़ एक किताब की चर्चा नहीं रहा, बल्कि आधुनिक मनुष्य के सामने खड़े आध्यात्मिक और नैतिक प्रश्नों पर गहन विमर्श में बदल गया.
संवाद के दौरान पवन के वर्मा ने स्पष्ट किया कि यह उपन्यास किसी दार्शनिक निष्कर्ष को स्थापित करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है. उनके अनुसार, यह एक ऐसी कथा है जो पाठक को प्रश्नों के बीच छोड़ देती है और उसे अपने अनुभव के आधार पर उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करती है. उन्होंने कहा कि कहानी की केंद्रीय घटना—एक महिला द्वारा एक संन्यासी को नदी पार कराना—दरअसल जीवन की उन सीमाओं का प्रतीक है, जिन्हें मनुष्य अक्सर सिद्धांतों और नियमों के नाम पर खड़ा कर लेता है.
उन्होंने कहा कि यह पुस्तक, जो जीवन, भक्ति, प्रेम और इच्छाओं के बीच संतुलन तलाशने वाली प्रतीकात्मक कथा है, ने मंच पर विचारों की तीव्र बहस पैदा की.
पवन के वर्मा ने शुरुआत में स्पष्ट किया कि उनकी किताब किसी दार्शनिक सिद्धांत का प्रचारक नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक और अनुभव-प्रधान कथा है, जिसमें साधारण घटना—एक महिला द्वारा साधु को नदी पार कराना—के ज़रिये मानव मन की जटिलताओं और बोधों को परखा गया है. उन्होंने बताया कि नदी, प्रेम, त्याग और प्रतिबद्धता जैसे तत्व उनके लिए प्रतीकात्मक रूप से उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना कि कथा-कथानक.
किश्वर देसाई ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए इस बात पर ध्यान दिलाया कि किताब में स्त्री पात्र की भूमिका केवल सहायक नहीं, बल्कि विचारोत्तेजक है. उनके अनुसार यह स्त्री चरित्र करुणा, मानवीय संवेदना और व्यावहारिक जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, जो कठोर आध्यात्मिक अनुशासन को चुपचाप प्रश्नांकित करता है. देसाई ने यह भी रेखांकित किया कि उपन्यास आज के समय में इसलिए ज़्यादा प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि यह त्याग और आकांक्षा के बीच किसी एक को सही ठहराने की बजाय दोनों के सहअस्तित्व की संभावना तलाशता है.
संवाद में यह प्रश्न बार-बार उभरा कि क्या आध्यात्मिकता का रास्ता जीवन से दूर होकर ही तय किया जा सकता है, या जीवन के अनुभव—प्रेम, संबंध और जिम्मेदारियाँ—भी आत्मबोध की यात्रा का हिस्सा हैं. पवन के वर्मा ने इस संदर्भ में कहा कि भारतीय दार्शनिक परंपरा हमेशा से इन प्रश्नों को द्वंद्व के रूप में नहीं, बल्कि संतुलन के रूप में देखती रही है, और यही दृष्टि इस किताब की बुनियाद है.
सत्र के दौरान दर्शकों की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही. प्रश्न-उत्तर के दौर में कई श्रोताओं ने किताब को निजी जीवन के निर्णयों से जोड़कर देखा और इसे आध्यात्मिक से अधिक मानवीय अनुभव की कथा के रूप में पढ़ने की बात कही. कुल मिलाकर फ़्रंट लॉन का यह सत्र गंभीर, शांत और विचारप्रधान रहा, जहाँ संवाद की गति तेज़ नहीं थी, लेकिन प्रश्न गहरे थे.
The Lady Who Carried the Monk Across the River पर हुआ यह संवाद पवन के वर्मा के लेखन के उस पक्ष को सामने लाता है, जहाँ वे दर्शन को उपदेश नहीं, बल्कि जीवन की सहज परिस्थितियों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के इस सत्र ने यह स्पष्ट किया कि यह किताब पढ़ी जाने से अधिक, सोची जाने वाली कृति है.