"भूमि पुनर्स्थापन लागत नहीं, निवेश है": मंगोलिया में भूपेंद्र यादव ने बताया कैसे भारत का ग्रीन क्रेडिट मॉडल बदल रहा पर्यावरण वित्तपोषण की तस्वीर
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगोलिया में UNCCD COP17 सम्मेलन में भारत के हरित वित्त ढांचे, ग्रीन क्रेडिट और सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड पहलों को साझा किया।
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केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने उलानबातर, मंगोलिया में UNCCD के 17वें पक्षकार सम्मेलन (COP17) में भाग लिया।
उन्होंने कहा कि भूमि पुनर्स्थापन लागत नहीं बल्कि भोजन, जल, जैव विविधता और दीर्घकालिक स्थिरता में निवेश है।
सार्वजनिक बजट से परे विविध व निरंतर वित्त स्रोतों तथा मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी की आवश्यकता पर दिया जोर।
भारत के मिश्रित हरित वित्त ढांचे, संप्रभु हरित बांड और अनूठी ग्रीन क्रेडिट पहल की दी जानकारी।
ग्रीन क्रेडिट के तहत पुनर्स्थापन के पांच वर्ष बाद 40 प्रतिशत वन आवरण घनत्व प्राप्त करने पर जारी होते हैं क्रेडिट।
मंगोलिया में भारत ने रखा भूमि पुनर्स्थापन का विजन
अनन्य सोच। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण निवारण सम्मेलन (यूएनसीसीडी) के 17वें पक्षकार सम्मेलन (सीओपी17) में हिस्सा लेते हुए 'स्वस्थ भूमि और सूखा प्रतिरोधकता के लिए नवाचारी वित्तीय तंत्र' विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भूमि पुनर्स्थापन को केवल एक खर्च के रूप में नहीं बल्कि भोजन, जल, जैव विविधता, आजीविका और दीर्घकालिक स्थिरता में किए गए निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।
सार्वजनिक बजट से आगे बढ़कर सोचने की जरूरत
यादव ने मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे जैसी वैश्विक चुनौतियों से व्यापक स्तर पर निपटने के लिए केवल सरकारी बजट पर निर्भर रहने की बजाय विविध, पूर्वानुमानित और निरंतर वित्त स्रोतों की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी आवश्यक है, ताकि पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए संसाधनों की कमी न हो।
भारत का मिश्रित हरित वित्त ढांचा बना मिसाल
अपने संबोधन में मंत्री ने भारत के मिश्रित हरित वित्त ढांचे का उल्लेख किया, जो जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, सतत भूमि उपयोग, वानिकी, कृषि, वृक्षारोपण और जैव विविधता संरक्षण के लिए वित्तपोषण को संभव बनाता है। उन्होंने भूमि पुनर्स्थापन, सूखा प्रतिरोध और सतत वानिकी जैसी पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के लिए पूंजी जुटाने के माध्यम के रूप में संप्रभु हरित बांडों की भूमिका को भी रेखांकित किया।
ग्रीन क्रेडिट पहल पर विशेष जोर
भूपेंद्र यादव ने भारत की अनूठी बाजार आधारित पहल ग्रीन क्रेडिट का विशेष उल्लेख किया, जो सार्वजनिक और निजी संस्थाओं को क्षतिग्रस्त वन भूमि के पुनर्स्थापन के लिए वित्तपोषण करने में सक्षम बनाती है। उन्होंने बताया कि पुनर्स्थापन के पांच वर्ष बाद और कम से कम 40 प्रतिशत वन आवरण घनत्व प्राप्त होने पर क्रेडिट जारी किए जाते हैं। इन क्रेडिट का उपयोग क्षतिपूर्ति वनरोपण, वैधानिक वृक्षारोपण या कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) दायित्वों के लिए एक बार किया जा सकता है, जो निजी क्षेत्र को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का एक व्यावहारिक तरीका माना जा रहा है।
क्षतिपूर्ति संरक्षण व्यवस्था की भी दी जानकारी
मंत्री ने भारत की क्षतिपूर्ति संरक्षण व्यवस्था का भी जिक्र किया, जिसके तहत वन भूमि के पुनर्स्थापन के लिए प्राप्त भुगतानों को क्षतिपूर्ति वनरोपण और पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन की दिशा में निर्देशित किया जाता है। साथ ही कॉर्पोरेट वित्तपोषण को पर्यावरणीय नियामक प्रक्रियाओं के माध्यम से एकीकृत करने की व्यवस्था भी बनाई गई है, ताकि निजी निवेश और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सके।
वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका मजबूत
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के वैश्विक मंचों पर भारत द्वारा साझा किए गए नवाचारी वित्तीय मॉडल न केवल घरेलू पर्यावरण संरक्षण के लिए उपयोगी हैं, बल्कि अन्य विकासशील देशों के लिए भी एक संभावित मार्गदर्शक ढांचे का काम कर सकते हैं, खासकर उन देशों के लिए जो मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण जैसी समान चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।