न्याय अदालतों से आगे. लोकतंत्र के जीवन से जुड़ा संवाद — डी.वाई. चंद्रचूड़

नवल पांडेय। JLF 2026 के ‘Ideas of Justice’ सत्र में संविधान, जमानत, स्वतंत्रता और संस्थागत पारदर्शिता पर गंभीर विमर्श

न्याय अदालतों से आगे. लोकतंत्र के जीवन से जुड़ा संवाद — डी.वाई. चंद्रचूड़

Ananya soch

अनन्य सोच।  जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 के चौथे दिन चारबाग वेन्यू में आयोजित “JLF 2026 के ‘Ideas of Justice’ सत्र में संविधान, जमानत, स्वतंत्रता और संस्थागत पारदर्शिता पर गंभीर विमर्श सत्र फेस्टिवल की सबसे गंभीर, प्रासंगिक और वैचारिक चर्चाओं में शुमार रहा. राजस्थान पत्रिका द्वारा प्रस्तुत इस सत्र में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी के बीच संवाद हुआ. यह बातचीत न्याय, संविधान और लोकतंत्र को केवल अदालतों और कानूनी शब्दावली तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें आम नागरिक के जीवन, स्वतंत्रता और सामाजिक चेतना से जोड़कर देखती है. दोपहर दो बजे शुरू हुआ यह संवाद धीरे-धीरे न्याय की अवधारणा को अदालत की चारदीवारी से निकालकर लोकतांत्रिक समाज की रोजमर्रा की वास्तविकताओं तक ले आया.

संवाद की शुरुआत करते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपनी चर्चित पुस्तक Why the Constitution Matters: Selected Speeches का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि संविधान को केवल एक कानूनी दस्तावेज मानना उसके साथ अन्याय है. संविधान लोकतंत्र की आत्मा है, जो न्याय, समानता और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को केवल परिभाषित नहीं करता, बल्कि उन्हें जीवंत बनाए रखता है. उनके अनुसार संविधान नागरिकों और संस्थाओं के बीच एक सतत संवाद है, जो समय के साथ बदलती सामाजिक वास्तविकताओं से टकराता है और उन्हीं टकरावों से मजबूत होता है. संविधान की शक्ति इसी में है कि वह स्थिर नहीं, बल्कि संवेदनशील और जीवंत बना रहता है.

लोकतंत्र के समकालीन संकटों पर बोलते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने संस्थागत अपारदर्शिता को सबसे बड़ा खतरा बताया. उन्होंने कहा कि जब निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती, तब नागरिकों का भरोसा कमजोर पड़ता है. यही अविश्वास धीरे-धीरे लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर देता है. इस पर वीर संघवी ने सवाल उठाया कि क्या आज संस्थाएं डर के कारण मौन हैं या नागरिकों की अपेक्षाएं ही बदल चुकी हैं. जवाब में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल मजबूत संस्थाओं से नहीं चलता, बल्कि उसे जागरूक और सवाल पूछने वाले नागरिकों की उतनी ही आवश्यकता होती है. नागरिकों की निष्क्रियता किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक है.

न्यायिक स्वतंत्रता और आपराधिक न्याय प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए जमानत और विचाराधीन कैद का मुद्दा प्रमुखता से उठा. उमर खालिद से जुड़े मामले के संदर्भ में पूछे गए सवाल पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली “निर्दोषता की धारणा” पर आधारित है. जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए, व्यक्ति को निर्दोष माना जाना चाहिए. प्री-ट्रायल जमानत सजा का विकल्प नहीं हो सकती. यदि कोई व्यक्ति पांच या सात वर्ष तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहे और अंत में बरी हो जाए, तो उसके खोए हुए वर्षों की भरपाई संभव नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि जमानत से इनकार केवल तीन परिस्थितियों में किया जा सकता है — जब आरोपी से समाज को गंभीर खतरा हो, उसके फरार होने की आशंका हो, या उसके द्वारा सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना हो. इसके अलावा जमानत आरोपी का संवैधानिक अधिकार है.

राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों पर बोलते हुए उन्होंने चिंता जताई कि कई कानून निर्दोषता की धारणा को उलट देते हैं और व्यक्ति को लगभग दोषी मान लेने की स्थिति बना देते हैं. उन्होंने कहा कि अदालतों का कर्तव्य है यह जांचना कि क्या वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बनता है और क्या हिरासत उस खतरे के अनुपात में है. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वर्षों तक जेल में बिताया गया समय और अंत में मिलने वाला न्याय अर्थहीन हो जाएगा.

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की एक बड़ी समस्या मुकदमों में अत्यधिक देरी को बताया. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार के साथ त्वरित सुनवाई का अधिकार भी निहित है. यदि कोई मुकदमा एक या तीन वर्ष में पूरा नहीं हो सकता, तो जमानत से इनकार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. उन्होंने बताया कि अपने कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 24 महीनों में 21 हजार से अधिक जमानत याचिकाओं का निपटारा किया. कई मामलों में देर रात तक सुनवाई कर नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की गई. पवन खेड़ा के मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी की आशंका के बीच सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल हस्तक्षेप कर संरक्षण प्रदान किया, इसके बावजूद शीर्ष अदालत पर जमानत न देने के आरोप लगाए जाते हैं.

निचली अदालतों की स्थिति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जिला और सत्र न्यायालयों में जमानत देने को लेकर भय का वातावरण बन गया है. कई न्यायाधीश संवेदनशील मामलों में जमानत देने से डरते हैं, क्योंकि उनकी नीयत और ईमानदारी पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं. इसी डर के कारण ऐसे मामले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं, जिन्हें निचली अदालतों में ही सुलझाया जा सकता है. उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट पर हर वर्ष लगभग 70 हजार मामलों का बोझ रहता है.

न्यायपालिका में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि न्यायाधीश भी समाज से आते हैं, लेकिन उच्च पदों पर बैठे लोगों से उच्च नैतिक मानकों की अपेक्षा की जाती है. भ्रष्टाचार किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है. नियुक्ति प्रक्रिया पर बोलते हुए उन्होंने अपने कार्यकाल का उदाहरण साझा किया, जब एक हाईकोर्ट जज की नियुक्ति पर सरकार की आपत्ति को सार्वजनिक किया गया, जिसमें उम्मीदवार की यौन पहचान का उल्लेख था. उन्होंने कहा कि यौन पहचान किसी की योग्यता या न्याय करने की क्षमता तय नहीं करती.

सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों द्वारा सरकारी या राजनीतिक पद स्वीकार करने के विषय पर उन्होंने चिंता जताई और ‘कूलिंग पीरियड’ की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं ऐसे पद स्वीकार नहीं किए, ताकि न्यायपालिका की निष्पक्षता पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे.

पूरे सत्र में वीर संघवी ने संवाद को संवेदनशील दिशा दी. चारबाग वेन्यू में मौजूद श्रोता इस बातचीत को केवल सुन नहीं रहे थे, बल्कि संविधान, न्याय और लोकतंत्र के अर्थों पर नए सिरे से सोच रहे थे. “Ideas of Justice” सत्र इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि इसने रेखांकित किया कि न्याय अब केवल अदालतों का विषय नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक का सरोकार है.