Jaipur Literature Festival: मशीन अनुवाद करेगी वह डुप्लीकेट होगा, सब कुछ होना फिर भी बचा रहेगा 

नवल पांडेय।

Jaipur Literature Festival: मशीन अनुवाद करेगी वह डुप्लीकेट होगा, सब कुछ होना फिर भी बचा रहेगा 

Ananya soch: Jaipur Literature Festival

अनन्य सोच।  जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आज लेखक और अनुवादक प्रभात रंजन को वाणी अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया. पुरस्कार समारोह के बाद आयोजित संवाद सत्र में प्रभात रंजन के साथ लेखिका और अनुवादक रोहिणी कुमारी मंच पर मौजूद रहीं। संवाद का संचालन वाणी प्रकाशन समूह की सीईओ अदिति माहेश्वरी ने किया। इस अवसर पर महोत्सव की सह-निदेशक नमिता गोखले, महोत्सव के निर्माता संजॉय के. रॉय और कवि-आलोचक यतीन्द्र मिश्र भी मंच पर उपस्थित थे. 

सत्र की चर्चा का केंद्र अनुवाद की रचनात्मक प्रक्रिया और उसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की बढ़ती भूमिका रही. प्रभात रंजन ने अनुवाद को भाषा के सौंदर्य से जुड़ा कर्म बताते हुए कहा कि जब वे अनुवाद करते हैं तो उनकी कोशिश रहती है कि मूल भाषा की खुशबू बची रहे। उन्होंने अनुवाद को “मसालदानी” से जोड़ते हुए कहा कि जैसे मसालदानी में अलग-अलग खुशबू वाले मसाले होते हैं, वैसे ही अनुवादक को अलग-अलग सुगंध वाले शब्द तलाशने पड़ते हैं. 

उन्होंने कहा कि उनकी भाषा हिंदी है और हिंदी पट्टी में पाठक चाहते हैं कि वे अंग्रेज़ी की अच्छी किताबें अपनी भाषा में पढ़ सकें. इसी “मसालदानी” में उनकी कोशिश रहती है कि वे अच्छी-अच्छी महक वाली किताबें हिंदी पाठकों तक अनुवाद के ज़रिये पहुँचाएँ. प्रभात रंजन ने ज़ोर देकर कहा कि अनुवादकों को भी वही सम्मान और महत्व मिलना चाहिए जो लेखकों को मिलता है. 

एआई की भूमिका पर बात करते हुए प्रभात रंजन ने कहा कि एआई एक सहायक टूल है और उससे अनुवाद करना न तो चोरी है और न अपराध. उन्होंने यह भी कहा कि किसी भाषा की जड़ जितनी मज़बूत होगी, एआई की भूमिका भी उतनी ही सार्थक होगी। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूरी तरह एआई पर निर्भर होना उचित नहीं है और अपनी भाषा की समझ अनिवार्य है. उनके अनुसार केवल जल्दी अनुवाद करने के लिए एआई की मदद लेना ठीक नहीं, क्योंकि अनुवाद ऐसा काम है जिसे समय देकर, ठहरकर किया जाना चाहिए. 

लेखिका और अनुवादक रोहिणी कुमारी ने कहा कि अब अनुवाद उनके जीवन का हिस्सा बन चुका है. उन्होंने बताया कि भले ही उन्होंने कोरियन भाषा में पढ़ाई की हो, लेकिन घर और संस्कार की भाषा हिंदी ही रही है. उन्होंने ट्रांसलेशन और इंटरप्रिटेशन के बीच के बारीक अंतर की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि अनुवाद करते समय यह समझना बेहद ज़रूरी है कि लक्षित पाठक कौन है. 

रोहिणी कुमारी ने कहा कि अनुवाद की भाषा में दूसरी भाषाओं के शब्दों की आवाजाही ज़रूरी है और केवल हिंदी की शुद्धता पर ज़ोर देकर काम नहीं चलेगा. एआई पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि एआई एक छोटे बच्चे की तरह है—हम उसे जैसा सिखाएंगे, वह वैसा ही सीखेगा। “हम एआई के गार्जियन हैं,” यह कहते हुए उन्होंने इसे अनुवादकों के लिए एक अवसर और उससे भी अधिक एक चुनौती बताया. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि एआई से किए गए अनुवाद की संपादन प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है. 

रोहिणी कुमारी ने यह भी कहा कि तकनीक से डरने की ज़रूरत नहीं है. जैसे पहले कंप्यूटर, इंटरनेट और स्मार्टफोन से लोगों को डराया गया, वैसे ही आज एआई को लेकर डर फैलाया जा रहा है, जबकि तकनीक अंततः मनुष्य को समृद्ध ही करती है. इस संदर्भ में उन्होंने कवि विनोद कुमार शुक्ल की कविता की पंक्ति उद्धृत करते हुए कहा—
“मशीन कुछ भी करेगी, वह डुप्लीकेट होगा,
सब कुछ होना फिर भी बचा रहेगा।”

कुल मिलाकर यह सत्र अनुवाद को केवल भाषा बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवेदना, सौंदर्य और विवेक से जुड़ा रचनात्मक कर्म के रूप में सामने लाता है, जिसमें एआई की भूमिका सहायक है, निर्णायक नहीं.