चुंबक की ताकत से पिघलेगा भविष्य! IIT पटना के वैज्ञानिकों ने बनाया ऐसा डिवाइस जो बदल देगा स्मार्ट टेक्नोलॉजी की दुनिया
सोचिए, कोई ऐसा तरल पदार्थ हो जो चुंबक के पास आते ही सेकंडों में ठोस जैसा सख्त बन जाए! यह विज्ञान कथा नहीं, बल्कि हकीकत है और अब IIT पटना के वैज्ञानिकों ने इसी "स्मार्ट फ्लूइड" के रहस्यों को समझने वाला एक ऐसा अनोखा उपकरण बनाया है, जो एयरोस्पेस से लेकर मेडिकल डिवाइस तक की तकनीक को नई ऊंचाई दे सकता है। जानिए क्या है यह खास आविष्कार...
अनन्य सोच। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान पटना (IIT Patna) के वैज्ञानिकों ने एक अभिनव हाइब्रिड मैग्नेटो-रियोमीटर (Hybrid Magneto-Rheometer) विकसित किया है, जो मैग्नेटोरियोलॉजिकल फ्लूइड (Magnetorheological Fluid) यानी एमआर द्रव जैसे "स्मार्ट मटेरियल" के व्यवहार को समझने का बिल्कुल नया तरीका प्रदान करता है। ये स्मार्ट तरल पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) के संपर्क में आते ही अपनी चिपचिपाहट इतनी बढ़ा लेते हैं कि सेकंडों में एक श्यानता-लोचदार ठोस (Viscoelastic Solid) में बदल जाते हैं।
अपनी इस अनोखी क्षमता के चलते ये फ्लूइड ब्रेक, क्लच, शॉक एब्जॉर्बर (Shock Absorber), डैम्पर, एक्चुएटर और मेडिकल डिवाइस (Medical Devices) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के लिए बेहद उपयोगी माने जाते हैं। लेकिन अब तक संपीड़न और अपरूपण (Compression and Shear) की स्थिति में इनके व्यवहार को समझना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था।
प्रोफेसर चिरंजीत सरकार की टीम ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के सहयोग से नैनो आयरन पाउडर आधारित एमआर द्रव तैयार किए और इसी हाइब्रिड रियोमीटर के जरिए चुंबकीय क्षेत्र की मौजूदगी और अनुपस्थिति, दोनों स्थितियों में इन द्रवों के रियोलॉजिकल (Rheological) और ट्राइबोलॉजिकल (Tribological) यानी घर्षण संबंधी गुणों का गहन अध्ययन किया।
वैज्ञानिकों द्वारा तैयार यह प्रोटोटाइप (Prototype) पारंपरिक विधियों की तुलना में एमआर द्रव के व्यवहार को कहीं बेहतर ढंग से समझने में सक्षम पाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के हाइब्रिड रियोमीटर भविष्य में पॉलिमर, फार्मास्यूटिकल्स, खाद्य प्रसंस्करण, सौंदर्य प्रसाधन और पेट्रोकेमिकल्स (Petrochemicals) जैसे क्षेत्रों में भी क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं।
यह महत्वपूर्ण अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल रियोलॉजिका एक्टा (Rheologica Acta) में प्रकाशित हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार यह खोज भविष्य में ऊर्जा-कुशल और अनुकूलनीय तकनीकों के विकास की राह खोल सकती है, जिसका सीधा लाभ रक्षा, एयरोस्पेस और स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलेगा।