Lokrang 2026 Jaipur: जवाहर कला केन्द्र में 22 राज्यों की Folk Art का रंगारंग आगाज़

Jaipur के जवाहर कला केन्द्र में 11 दिवसीय Lokrang 2026 शुरू। 6 नवंबर तक 22 राज्यों के कलाकार Folk Dance, संगीत और Handicraft Mela में प्रस्तुति देंगे।

Oct 27, 2026 - 20:48
Oct 27, 2026 - 20:55
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Lokrang 2026 Jaipur: जवाहर कला केन्द्र में 22 राज्यों की Folk Art का रंगारंग आगाज़
जवाहर कला केन्द्र, जयपुर के मुक्ताकाशी मंच पर लोकरंग 2026 के उद्घाटन में पारंपरिक वेशभूषा में लोक कलाकार प्रस्तुति देते हुए।

अनन्य सोच । गुलाबी नगरी मंगलवार को लोक संस्कृति की खुशबू से महक उठी। जवाहर कला केन्द्र (JKK) में 11 दिवसीय राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव 'लोकरंग' के 29वें संस्करण का रंगारंग शुभारंभ हुआ। 27 अक्टूबर से 6 नवंबर तक चलने वाले इस Folk Art Festival में लक्षद्वीप, लद्दाख, त्रिपुरा, नागालैंड, असम, मणिपुर, सिक्किम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ सहित करीब 22 राज्यों के कलाकार अपनी जड़ों की रंगत पेश करेंगे।

'आओ आओ रे' के सुरों से हुई शुरुआत

JKK की महानिदेशक शुचि त्यागी, अतिरिक्त महानिदेशक गोपाल राम बिरडा और आईएएस मनीषा अरोड़ा ने दीप जलाकर उद्घाटन किया। उद्घाटन गीत 'आओ आओ रे' की गूंज के साथ समारोह शुरू हुआ। इसके बाद मांगणियार कलाकारों के साथ मंच पर नन्हे बच्चों ने खड़ताल बजाते हुए प्रस्तुति दी, तो दर्शक तालियों से झूम उठे।

पंजाब से मणिपुर तक, हर Performance में अलग तहज़ीब

मुक्ताकाशी मंच पर कई अंचलों की Folk Dance और संगीत प्रस्तुतियों ने समां बांधा। पंजाब के लुड्डी पर लड़कियों ने जोशीला नृत्य किया। राजस्थान की चरी में महिला कलाकारों ने सिर पर जलती चरी रखकर संतुलन का बेमिसाल नज़ारा दिखाया। मणिपुर के कलाकारों ने चेरोल जगोई में स्टिक पर संतुलन साधा। हिमाचल की नाटी, राजस्थान का घूमर, मणिपुर का लाई हरोबा, छत्तीसगढ़ की गेड़ी, जम्मू-कश्मीर की जागरणा और पुरुलिया छऊ में महिषासुर की प्रस्तुति भी आकर्षण रहीं।

शिल्पग्राम में Rajasthani Culture और Handicraft Mela

शिल्पग्राम में निवाई के बनवारी जाट ने कच्छी घोड़ी, सीकर के बुंदू खां ने लोक गायन, जयपुर की कमली सपेरा ने कालबेलिया और दौसा की लाली ने पद गायन प्रस्तुत किया। यहीं राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला भी लगा है, जहां करीब 150 शिल्पकार अपनी कारीगरी दिखा रहे हैं। हथकरघा वस्त्र, पारंपरिक आभूषण, टेराकोटा, काष्ठ कला, चमड़े की नक्काशी, लोक चित्रकला और धातु शिल्प एक ही जगह उपलब्ध हैं।

लोकरंग केवल उत्सव नहीं, बल्कि लुप्तप्राय परंपराओं को बचाने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी है। आने वाले दिनों में और राज्यों की प्रस्तुतियां देखने को मिलेंगी।