एक बैग से बदली किस्मत! असम की विशाखा दीदी की कहानी, जिसने बांस को बना दिया सोना
अनन्य सोच । कभी सिर्फ झोपड़ी और टोकरी बनाने के काम आने वाला बांस आज देशभर में हजारों लोगों की आजीविका का बड़ा जरिया बन चुका है। गुरुग्राम में आयोजित सरस आजीविका मेले में एक ऐसी ही प्रेरक कहानी सामने आई, जो बताती है कि कैसे एक छोटा सा गांव का उद्यम राष्ट्रीय स्तर की सफलता में बदल सकता है। आखिर क्या है यह पूरी कहानी, जानिए विस्तार से।
बांस के थैले से शुरू हुआ सफर, अब हो रही लाखों की कमाई
असम की विशाखा दीदी ने साल 2014 में एक साधारण Bamboo Bag बनाया था। Self Help Group से जुड़ने के बाद उन्होंने अपने ससुर के पुराने बांस शिल्प कारोबार को नए डिजाइनों के साथ फिर से खड़ा किया। सरकारी मदद और प्रदर्शनियों के जरिए उनका काम बड़े बाजारों तक पहुंचा। साल 2025 में उन्होंने भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में हिस्सा लिया और बांस उत्पादों की बिक्री से करीब 2 लाख रुपये कमाए।
अंग्रेजों के जमाने का कानून बना था सबसे बड़ी रुकावट
दिलचस्प बात यह है कि सालों तक बांस पर एक पुराना ब्रिटिश कालीन कानून भारी पड़ता रहा, जिसके तहत बांस को "पेड़" की श्रेणी में रखा गया था। इससे इसकी कटाई और परिवहन बेहद मुश्किल हो गया था। लेकिन 2017 में सरकार ने बांस को इस दायरे से बाहर निकालकर एक बड़ा फैसला लिया, जिसने पूरे Bamboo Sector में नवाचार और उद्यमिता के नए रास्ते खोल दिए। इसका असर आज पूर्वोत्तर भारत में साफ नजर आता है।
सिक्किम से त्रिपुरा तक, हर राज्य में लिख रहे सफलता की कहानी
सिक्किम की फैशन डिजाइनर चिमी ओंगमु भूटिया का Lagstil Design Studio महिलाओं के नेतृत्व में बांस से हस्तशिल्प और फर्नीचर बना रहा है। त्रिपुरा में बिजय सूत्रधार ने टेक्नोलॉजी अपनाकर उत्पादन को बेहतर बनाया, तो नागालैंड में स्वयं सहायता समूह बांस से खाद्य उत्पाद तैयार कर रहे हैं। वहीं मिजोरम में वैज्ञानिक तरीकों से बांस की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सरकारी मिशन से किसानों को भी मिल रहा फायदा
National Bamboo Mission के जरिए किसानों को भी सीधा लाभ मिल रहा है। मध्य प्रदेश के विजय पाटीदार ने 2019 में परंपरागत खेती छोड़कर करीब 4000 बांस के पौधे लगाए और दो साल में ही 75 हजार रुपये कमा लिए। साथ ही उन्होंने मिर्च और अदरक जैसी अंतर्फसलें भी उगाईं, जिससे यह साबित होता है कि बांस अब सिर्फ शिल्प नहीं, बल्कि किसानों के लिए स्थायी आय का जरिया बन चुका है।