जब घर की पुरानी "संदूक" बन गई कैनवास — 100 चित्रकारों ने रंगों से लिखी विरासत की कहानी

क्या कभी सोचा है कि दादी-नानी के जमाने की पुरानी संदूक, जो अब घरों के कोनों में धूल फांक रही है, एक दिन आर्ट गैलरी की शान बन सकती है? जयपुर में हुए एक अनोखे आयोजन ने यही कर दिखाया — जानिए कैसे 150 साल पुरानी संदूकों ने बयां की समाज, संस्कृति और पर्यावरण की पूरी कहानी।

Jul 12, 2026 - 20:49
Jul 13, 2026 - 11:13
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जब घर की पुरानी "संदूक" बन गई कैनवास — 100 चित्रकारों ने रंगों से लिखी विरासत की कहानी

अनन्य सोच। राजस्थान ललित कला अकादमी में रविवार को कुछ ऐसा हुआ, जिसने आर्ट लवर्स को हैरान कर दिया। मौका था 17वें रंग मल्हार आर्ट फेस्टिवल का, जहां इस बार कैनवास की जगह ली पुरानी लकड़ी और लोहे की संदूकों ने। जयपुर और आसपास के इलाकों से आए 100 से ज़्यादा आर्टिस्ट्स ने अपनी कल्पनाओं के रंग इन डेढ़ सौ साल पुरानी ट्रेडिशनल संदूकों से लेकर मॉडर्न डिज़ाइन की संदूकों तक पर बिखेरे। इन कलाकृतियों में झलकी कल्चर, हेरिटेज, पुरानी यादें, नेचर, एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन और सोशल इशूज की गहरी सोच।

क्यों चुनी गई संदूक?

इवेंट के संयोजक और सीनियर पेंटर विद्यासागर उपाध्याय बताते हैं कि 2010 से लगातार चल रहा यह आयोजन सिर्फ आर्ट क्रिएशन तक सीमित नहीं, बल्कि इसका मकसद राजस्थान में अच्छी बारिश और खुशहाली की कामना करना भी है। हर साल एक अलग ऑब्जेक्ट पर पेंटिंग करवाई जाती है ताकि लोगों में उस चीज़ के प्रति नई संवेदनशीलता जगे। इस बार संदूक को इसलिए चुना गया क्योंकि यह घरों से धीरे-धीरे गायब हो रही एक अनमोल धरोहर बन चुकी है।

कभी संपन्नता का प्रतीक थी संदूक

सीनियर आर्टिस्ट विनय शर्मा बताते हैं कि एग्ज़िबिशन में डेढ़ सौ साल पुरानी संदूकों से लेकर आधुनिक संदूक तक डिस्प्ले की गई हैं। पुराने ज़माने में संदूक किसी भी फैमिली की समृद्धि और स्टेटस का सिंबल हुआ करती थी — जिस घर में जितनी ज़्यादा संदूकें, उतना ही संपन्न माना जाता था परिवार। उन्होंने खुद अपनी आर्टवर्क में पुरानी घड़ियों और कीमती चीज़ों को सहेजने की परंपरा को उकेरा है।

हर कलाकार की अपनी कहानी

यंग आर्टिस्ट देवेंद्र कुमार ने लकड़ी के छोटे टुकड़ों से एक यूनीक ज्वेलरी बॉक्स तैयार किया, जो उनकी सिग्नेचर स्टाइल है। वहीं सौरभ यादव ने ट्रक ड्राइवर्स की जिंदगी को थीम बनाकर एक पुरानी संदूक को स्प्रे पेंट और एक्रेलिक कलर्स से ट्रक की शक्ल दे दी, जिस पर लिखा "भगवान भरोसे" — यह उन मेहनतकश लोगों के स्ट्रगल को समर्पित रहा। सीनियर पेंटर श्वेत गोयल ने संदूक पर श्रीनाथजी और राजस्थान की मशहूर पिछवाई आर्ट स्टाइल को मॉडर्न टच के साथ प्रस्तुत किया, जो फैमिली हेरिटेज और यादों का प्रतीक बनी।

यह आर्ट फेस्टिवल सिर्फ पेंटिंग एग्ज़िबिशन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक सफर बन गया, जिसने हर दर्शक को अपने बचपन और पुरानी यादों से जोड़ दिया।