उद्यमियों के लिए बड़ी राहत, RIICO ने बदले नियम, अब नहीं होगी टाइम लिमिट की टेंशन

इंडस्ट्रियल प्लॉट्स में बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे उद्यमियों को मिलेगा एक साल का एक्स्ट्रा टाइम, पुरानी पेनल्टी भी होगी एडजस्ट

Sep 10, 2026 - 22:39
Sep 10, 2026 - 23:03
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उद्यमियों के लिए बड़ी राहत, RIICO ने बदले नियम, अब नहीं होगी टाइम लिमिट की टेंशन

अनन्य सोच। राजस्थान में इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देने और उद्यमियों के लिए बिजनेस फ्रेंडली माहौल बनाने की दिशा में RIICO ने एक बड़ा फैसला लिया है। निगम ने अपने डिस्पोजल ऑफ लैंड रूल्स, 1979 के नियम 21 और नियम 3(एजे) में आंशिक संशोधन कर दिया है, जिससे हजारों उद्यमियों को राहत मिलने की उम्मीद है।

बुनियादी सुविधाओं के अभाव में मिलेगा एक साल का अतिरिक्त समय

नए संशोधन के मुताबिक, अगर किसी उद्यमी को ऐसे इंडस्ट्रियल एरिया में प्लॉट अलॉट होता है जहां अप्रोच रोड, इंटरनल रोड या बिजली जैसी बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाएं मौजूद नहीं हैं, तो उस क्षेत्र के डेवलप्ड घोषित होने तक उसे प्रोजेक्ट के विभिन्न चरण पूरे करने और कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू करने की समयसीमा में राहत दी जाएगी। यह छूट संबंधित क्षेत्र के डेवलप्ड घोषित होने की तारीख से एक साल तक के लिए उपलब्ध रहेगी।

अब तक क्या थी समस्या, समझिए पूरा मामला

दरअसल, ई-नीलामी या डायरेक्ट अलॉटमेंट स्कीम-2025 के तहत प्लॉट अलॉट होने के एक महीने के भीतर कब्जा लेना जरूरी होता है। ऐसा नहीं होने पर डीम्ड पजेशन मानते हुए निर्माण पूरा करने और उत्पादन शुरू करने की समयसीमा की गिनती अपने आप शुरू हो जाती थी। एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस की जरूरत न होने वाली परियोजनाओं के लिए यह अवधि दो साल और क्लीयरेंस जरूरी होने वाली परियोजनाओं के लिए तीन साल तय है। परेशानी तब बढ़ती थी जब इस दौरान जरूरी बुनियादी सुविधाएं ही मौजूद नहीं होतीं, फिर भी तय समयसीमा में प्रोजेक्ट पूरा न करने पर पेनल्टी का प्रावधान भी था।

उद्यमियों की मांग पर हुआ बदलाव, अब कैसे मिलेगा फायदा

लगातार मिल रही शिकायतों के बाद RIICO ने नियमों में यह बदलाव किया। संशोधित नियमों के तहत अब जिन प्रोजेक्ट्स के लिए एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस जरूरी नहीं है, उन्हें अलॉटमेंट की तारीख से दो साल या क्षेत्र के डेवलप्ड घोषित होने की तारीख से एक साल, जो भी बाद में हो, के भीतर उत्पादन शुरू करना होगा। वहीं क्लीयरेंस जरूरी होने वाली परियोजनाओं के लिए यह अवधि तीन साल या डेवलपमेंट डिक्लेरेशन से एक साल, जो भी बाद में हो, रखी गई है। खास बात यह है कि पहले से लगी पेनल्टी को भी आगामी बकाया शुल्क में समायोजित किया जा सकेगा।

अधिकारियों का कहना है कि यह कदम राज्य में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को मजबूत करेगा और इससे इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स तेजी से पूरे होंगे, जिससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।