जब एक मंच पर मिले भारत के रंग, लोक परंपरा और आधुनिक सोच: जयपुर के कला शिविर में जीवंत हुई देश की सांस्कृतिक आत्मा
14 राज्यों के 20 प्रतिष्ठित कलाकारों का अद्भुत संगम, Padma Shri कलाकारों से लेकर युवा रचनाकारों तक ने कैनवास पर उकेरी भारत की विविधता
अनन्य सोच। राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC), जयपुर और पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (WZCC), उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय ‘लोक एवं समकालीन कला शिविर’ इन दिनों कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। देश के 14 राज्यों से आए 20 प्रतिष्ठित कलाकार यहां केवल अपनी कला का प्रदर्शन ही नहीं कर रहे, बल्कि दर्शकों को सृजन की प्रक्रिया से भी रूबरू करा रहे हैं। यह शिविर भारतीय Folk Art, Contemporary Art और सांस्कृतिक विरासत के अनूठे संगम का सजीव उदाहरण बन गया है।
शेखावाटी की भित्ति कला से प्रेरित हैं शुभ्रतो मंडल
शांतिनिकेतन परंपरा से जुड़े प्रसिद्ध कलाकार एवं कला-चिंतक शुभ्रतो मंडल ने बताया कि राजस्थान, विशेष रूप से Shekhawati Fresco Art, ने उनके कलात्मक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया है। नंदलाल बोस, बंगाल स्कूल और Kalighat Painting से प्रेरित शुभ्रतो अपनी कला में सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय विषयों को आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं।
उनकी कलाकृतियों में राजस्थान की लोक संस्कृति और बंगाल की कलात्मक विरासत का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वर्तमान में वे संत कबीर, सूफी दर्शन और भक्ति परंपरा पर आधारित नई कला श्रृंखला पर कार्य कर रहे हैं।
स्मृतियों और प्रकृति को कैनवास पर जीवित रखते हैं चरण शर्मा
जयपुर में जन्मे और पिछले पांच दशकों से मुंबई में सक्रिय वरिष्ठ कलाकार चरण शर्मा भारतीय समकालीन कला जगत का महत्वपूर्ण नाम हैं। उनकी कला उन स्मृतियों और प्राकृतिक धरोहरों को समर्पित है जो आधुनिक जीवन की भागदौड़ में धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं।
उनकी पेंटिंग्स में पुराने पोस्ट बॉक्स, Aravalli Hills, बाघ और लोक संस्कृति के प्रतीक प्रमुखता से दिखाई देते हैं। खास बात यह है कि वे किसी भी चित्र को बनाने से पहले कविता लिखते हैं और फिर उसी भाव को रंगों के माध्यम से कैनवास पर उतारते हैं।
500 वर्ष पुरानी Mask Art को नई पहचान दे रहे हैं खागेन गोस्वामी
असम के प्रसिद्ध कलाकार खागेन गोस्वामी ने अपनी पारंपरिक Mask Art से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने बताया कि यह कला लगभग 500 वर्ष पूर्व महान संत श्रीमंत शंकरदेव द्वारा शुरू की गई थी और आज भी असम के वैष्णव सत्रों में संरक्षित है।
पर्यावरण-अनुकूल सामग्री से बनाए जाने वाले ये मुखौटे अब केवल धार्मिक नाट्य मंचन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश-विदेश के पर्यटकों के बीच सजावटी कला के रूप में भी लोकप्रिय हो रहे हैं। इससे स्थानीय कलाकारों को रोजगार और वैश्विक पहचान दोनों मिल रही हैं।
Padma Shri परेश राठवा: Pithora Art को दिलाई वैश्विक पहचान
शिविर के प्रमुख आकर्षणों में शामिल Padma Shri परेश राठवा ने गुजरात की प्रसिद्ध Pithora Art के माध्यम से आदिवासी जीवन, आस्था और लोक संस्कृति के रंगों को जीवंत किया। छोटा उदयपुर के रहने वाले परेश राठवा ने इस पारंपरिक कला को घरों की दीवारों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
उनके प्रयासों से आज पिथोरा कला नई पीढ़ी के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। वर्ष 2023 में भारत सरकार ने आदिवासी सांस्कृतिक विरासत और लोककला संरक्षण में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें Padma Shri Award से सम्मानित किया था।
कला शिविर बन रहा सांस्कृतिक संवाद का मंच
इस कला शिविर में आने वाले विद्यार्थी, शोधार्थी और कला प्रेमी कलाकारों से सीधे संवाद कर उनकी तकनीक, विचारधारा और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझ रहे हैं। यही कारण है कि यह आयोजन केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और आधुनिक रचनात्मकता के बीच संवाद का सशक्त मंच बनता जा रहा है।
जयपुर में आयोजित यह कला महोत्सव इस बात का प्रमाण है कि भारत की लोक और समकालीन कला आज भी उतनी ही जीवंत, प्रासंगिक और प्रेरणादायक है, जितनी सदियों पहले थी।