मोहम्मद वकील की आवाज़ पर पिता की याद में नम हुईं सैकड़ों आंखें, 'वीर-ज़ारा' की क़व्वाली पर थम न सकीं तालियां
जयपुर के जवाहर कला केंद्र में एक ऐसी शाम सजी, जहां सुरों ने सरहदें मिटा दीं और जज़्बातों ने भाषा को पीछे छोड़ दिया। मोहम्मद वकील की आवाज़ जब डॉ. बशीर बद्र की ग़ज़ल पर ठहरी, तो पूरा सभागार सांस रोककर सुनता रह गया — फिर अचानक माहौल पलटा और "केसरिया बालम" की धुन पर लोग झूम उठे। आख़िर क्या हुआ उस रात, जिसने हर सुनने वाले को अंत तक बांध रखा
अनन्य सोच। जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में सोमवार सायं 7 बजे आयोजित ग़ज़ल संध्या ने Music, Literature और Emotion का ऐसा संगम पेश किया, जो देर तक लोगों के ज़ुबां पर रहेगा। बॉलीवुड के मशहूर Ghazal Singer और ऑल इंडिया रेडियो के टॉप ग्रेड कलाकार मोहम्मद वकील ने अपनी सुमधुर आवाज़ और Classical Music की गहराई से Audience को मंत्रमुग्ध कर दिया। Auditorium खचाखच भरा रहा और हर Performance पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही।
35 साल के संगीत सफ़र को मंच पर जीवंत करते हुए वकील ने प्रेम, विरह और रिश्तों की गहराई से जुड़ी Ghazals पेश कीं, जिनमें Sufi रंग और भावपूर्ण अंदाज़ का अनूठा मेल दिखा। शाम का सबसे Emotional Moment तब आया, जब उन्होंने डॉ. बशीर बद्र की मशहूर ग़ज़ल "ये कसक दिल के दिल में चुभी रह गई" पेश की — सभागार में सन्नाटा छा गया।
इसके बाद शायर शकील आज़मी की पिता को समर्पित एक Touching नज़्म ने तो जैसे हर दिल को छू लिया। कई लोगों की आंखें नम हो गईं, और देर तक तालियों की गूंज थमी नहीं।
मूड बदला तो माहौल भी बदला — "केसरिया बालम" की Rajasthani Folk प्रस्तुति ने स्थानीय रंग बिखेरा, जबकि फ़िल्म "वीर-ज़ारा" की Qawwali पर पूरा हॉल झूम उठा। यहीं इस ग़ज़ल संध्या में Festival जैसा उत्साह नज़र आया।
वायलिन पर गुलज़ार हुसैन, सितार पर सुजाता मोठिया, तबले पर मेराज हुसैन और कीबोर्ड पर रहबर हुसैन की Live Performance ने हर Song को और निखार दिया। Anchor अनामिका अनंत ने अपनी सहज और साहित्यिक Hosting Style से कार्यक्रम को संजोए रखा।