‘बैंया न धरो’ से ‘चिट्ठी आई है’ तक... ‘सुरीला सफर’ में गूंजे सदाबहार नगमे, हर गीत के साथ तालियों से गूंज उठा सभागार
अनन्य सोच। जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में रविवार शाम संगीत सिर्फ सुनाई नहीं दिया, बल्कि हर दिल में उतरता चला गया। स्वर साधना फाउंडेशन की संगीतमय प्रस्तुति ‘सुरीला सफर’ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और मदन मोहन के सदाबहार गीतों ने ऐसा समां बांधा कि चार घंटे तक श्रोता अपनी सीटों से उठना ही भूल गए। कभी तालियां गूंजीं तो कभी आंखें नम हुईं, और अंत तक पूरा सभागार सुरों के जादू में डूबा रहा।
जयपुर। जवाहर कला केन्द्र के रंगायन सभागार में आयोजित ‘सुरीला सफर’ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सदाबहार हिंदी फिल्म संगीत का आकर्षण आज भी पहले जैसा बरकरार है। स्वर साधना फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस विशेष संगीतमय संध्या में महान संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और मदन मोहन की अमर धुनों को कलाकारों ने अपनी मधुर आवाज़ से जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत ‘के जान चली जाए’ से हुई और इसके बाद ‘बैंया न धरो ओ बलमा’, ‘सावन के झूलों ने मुझको’, ‘तेरा बीमार मेरा दिल’ और ‘ड्रीम गर्ल’ जैसी प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को स्वर्णिम दौर की यादों में पहुंचा दिया। हर गीत के साथ सभागार तालियों से गूंज उठा।
इसके बाद ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे’, ‘नैनों में बदरा छाए’, ‘वो भूली दास्तां’, ‘जिया ले गयो’, ‘काटे नहीं कटते’, ‘एक दो तीन’, ‘सुन जा ऐ ठंडी हवा’, ‘तेरे संग प्यार में’ और ‘मेरी किस्मत में तू नहीं शायद’ जैसी कालजयी प्रस्तुतियों ने माहौल को और भी सुरमय बना दिया।
कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में ‘कैसे कटेगी जिंदगी’, ‘कोई शहरी बाबू’, ‘हवा हवाई’, ‘सांझ ढले गगन तले’, ‘आपके पहलू में आकर’, ‘झुमका गिरा रे’, ‘माई नेम इज़ एंथनी गोंजाल्विस’, ‘प्यार करने वाले कभी डरते नहीं’, ‘मेरे दिल ने तड़प के’, ‘माई री मैं कासे कहूं’, ‘कागज़ कलम दवात ला’, ‘मैं तो तुम संग नैन मिला के’ और समापन गीत ‘मोहब्बत क्या चीज़ है’ ने पूरे सभागार को भाव-विभोर कर दिया।
कार्यक्रम का सबसे भावुक पल तब आया, जब कारगिल विजय दिवस पर ‘चिट्ठी आई है’ की मार्मिक प्रस्तुति दी गई। पूरा सभागार खड़ा होकर वीर शहीदों को नमन करता नजर आया। वहीं दिवंगत संगीत विभूतियों को भी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। करीब चार घंटे तक चले इस आयोजन का सफल सीधा प्रसारण भी किया गया, जिससे देश-विदेश के संगीत प्रेमी भी इससे जुड़े। समापन पर सभी कलाकारों का सम्मान किया गया। दर्शकों ने एक स्वर में कहा कि ‘सुरीला सफर’ केवल एक संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि हिंदी फिल्म संगीत की स्वर्णिम विरासत को जीवंत करने वाला यादगार उत्सव था।