राजा नपुंसक, रानी को भेजा गया पराए पुरुष के पास एक रात के लिए — जयपुर में मंचित हुआ ये विवादित कालजयी नाटक

एक राजा जो पिता नहीं बन सकता... एक रानी जिसे राज्य की खातिर पति के अलावा किसी और के पास भेजा जाता है... और एक रात जो पूरे राज्य की तकदीर बदल देती है। जयपुर के रंगप्रेमियों के लिए आ रहा है हिंदी रंगमंच का एक ऐसा कालजयी नाटक, जो आज भी उतने ही सवाल खड़े करता है जितने पचास साल पहले करता था।

Jul 24, 2026 - 19:49
Jul 24, 2026 - 19:52
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राजा नपुंसक, रानी को भेजा गया पराए पुरुष के पास एक रात के लिए — जयपुर में मंचित हुआ ये विवादित कालजयी नाटक

अनन्य सोचरंग मस्ताने संस्था (Rang Mastane Sanstha) द्वारा हिंदी रंगमंच के सुप्रसिद्ध नाटककार सुरेंद्र वर्मा के कालजयी नाटक "सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक" का मंचन किया जा रहा है। इस प्रस्तुति का निर्देशन युवा रंगकर्मी एवं संगीत नाटक अकादमी (Sangeet Natak Akademi) से सम्मानित अभिषेक मुद्गल कर रहे हैं। वर्ष 1972 में लिखा गया यह नाटक हिंदी रंगमंच की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है, जो भारतीय समाज, सत्ता, स्त्री-अस्मिता (Women's Identity) और नैतिक मूल्यों पर गहरे प्रश्न खड़े करता है।

नाटक की कथा दसवीं शताब्दी के प्राचीन मल्ल साम्राज्य (Mall Empire) की पृष्ठभूमि पर टिकी है। राज्य के राजा ओकाक संतानहीन हैं और उनकी नपुंसकता राजमहल का सबसे बड़ा रहस्य है — लेकिन समय के साथ यह राज़ पूरे राज्य के भविष्य के लिए खतरा बन जाता है। उत्तराधिकारी न होने से पड़ोसी राज्यों के आक्रमण और सत्ता के विघटन का डर मंडराने लगता है।

इसी संकट से निपटने के लिए राजसभा प्राचीन 'नियोग' (Niyog) प्रथा अपनाने का फैसला करती है — जिसके तहत राजा को अपनी प्रिय पत्नी रानी शीलवती को एक रात के लिए किसी अन्य पुरुष के साथ भेजने के लिए मजबूर किया जाता है, ताकि राज्य को वारिस मिल सके। यह फैसला सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि राजा-रानी दोनों के जीवन का सबसे बड़ा भावनात्मक संकट बन जाता है।

रानी शीलवती के लिए विवाह सिर्फ शारीरिक रिश्ता नहीं, बल्कि विश्वास और आत्मिक प्रेम का बंधन है — इसलिए यह आदेश उसके स्वाभिमान और वैवाहिक निष्ठा पर गहरी चोट करता है। वहीं राजा ओकाक अपनी असहायता और प्रेम के बीच टूटता नज़र आता है। सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब नियोग की वह रात रानी के भीतर एक नया आत्मबोध जगा देती है — वह पहली बार खुद के अस्तित्व, इच्छाओं और स्त्री होने के अधिकारों को नए नज़रिए से देखती है।

पितृसत्ता (Patriarchy), प्रेम, सत्ता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गहरा विमर्श करने वाला यह नाटक अपनी सशक्त भाषा और मनोवैज्ञानिक गहराई के लिए जाना जाता है। प्रस्तुति में झिलमिल दुआ, विवेक जाखड़, अपूर्वा, यशवानी शर्मा, ऋषभ, भूपेंद्र, रोशिक और अमित चौधरी अभिनय करते नजर आएंगे।