जब किताबों ने उठाए समाज और सिनेमा से जुड़े बड़े सवाल: ‘उर्फ सिनेमा’ और ‘मुक्ति का सपना’ पर मंथन में उमड़ा साहित्य जगत
अविनाश। Jaipur Literary Event में Cinema, Poetry, Democracy और Social Justice पर हुई गहन चर्चा, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने रखे बेबाक विचार। Jaipur में आयोजित Literary Event में ‘Urf Cinema’ और ‘Mukti Ka Sapna tatha Anya Kavitayen’ का लोकार्पण हुआ। Cinema, Poetry, Democracy, Social Justice और Hindi Literature पर हुई सार्थक चर्चा में साहित्य जगत की प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं।
अनन्य। क्या भारतीय Cinema सचमुच आम आदमी की कहानी कहता है? क्या Poetry आज भी समाज में बदलाव का माध्यम बन सकती है? इन्हीं सवालों के बीच रविवार को जयपुर में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम चर्चा का केंद्र बन गया। Progressive Writers Association Jaipur और Bodhi Prakashan के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित Book Launch and Discussion Program में दो महत्वपूर्ण पुस्तकों— ‘उर्फ सिनेमा’ और ‘मुक्ति का सपना तथा अन्य कविताएँ’— का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, सिनेमा और सामाजिक सरोकारों पर गंभीर विमर्श ने उपस्थित लोगों को अंत तक बांधे रखा।
राजस्थान समग्र सेवा संघ के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक ओम थानवी ने कहा कि भारतीय Hindi Cinema आज भी अपनी वास्तविक सामाजिक पहचान की तलाश में है। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा के सिनेमा में आमजन के संघर्ष, सपनों और जीवन की वास्तविक कहानियां लगातार हाशिए पर चली गई हैं। उनके अनुसार ‘उर्फ सिनेमा’ भारतीय सिनेमा के इतिहास, उसकी उपलब्धियों और सीमाओं को समझने का एक गंभीर प्रयास है।
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र बोड़ा ने कहा कि सिनेमा को केवल देखना नहीं, बल्कि पढ़ना और समझना भी जरूरी है। उन्होंने पुस्तक के लेखकों दीपक कुमार राय और राम मुरारी को सिनेमा का गंभीर अध्येता बताते हुए कहा कि यह पुस्तक भारतीय सिनेमा के वैचारिक और सांस्कृतिक पक्षों पर नए सवाल खड़े करती है।
वहीं कथाकार तसनीम खान ने काव्य-संग्रह ‘मुक्ति का सपना तथा अन्य कविताएँ’ पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रेम, करुणा और प्रतिरोध आज के समय की सबसे बड़ी सांस्कृतिक ताकत हैं। उन्होंने बताया कि कवयित्री पूनम भाटिया की रचनाएं Child Labour, Social Inequality, Women Empowerment, Democracy और मानवीय संवेदनाओं जैसे विषयों को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कानूनविद प्रेमकृष्ण शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि दोनों पुस्तकें केवल साहित्यिक कृतियां नहीं, बल्कि समाज को समझने और बेहतर भविष्य की कल्पना करने का माध्यम हैं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लेखक, कवि, पत्रकार, शिक्षक और साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि जयपुर का साहित्यिक परिदृश्य आज भी विचारों की नई रोशनी से जगमगा रहा है।