कोलकाता में गरजे स्पीकर देवनानी: "बिना विधायिका की मंजूरी जनता का एक रुपया भी खर्च नहीं हो सकता", वित्तीय स्वायत्तता पर दिया सीधा संदेश

क्या आप जानते हैं कि सरकार जनता के पैसे का एक-एक रुपया खर्च करने से पहले किसकी इजाजत लेती है? इस सवाल का जवाब देते हुए राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कोलकाता में एक ऐसा बयान दिया, जिसने वित्तीय जवाबदेही (Financial Accountability) की पूरी व्यवस्था को नए सिरे से समझा दिया।

Jul 4, 2026 - 10:56
Jul 4, 2026 - 10:57
 0
कोलकाता में गरजे स्पीकर देवनानी: "बिना विधायिका की मंजूरी जनता का एक रुपया भी खर्च नहीं हो सकता", वित्तीय स्वायत्तता पर दिया सीधा संदेश

अनन्य सोच। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कोलकाता में पश्चिम बंगाल विधानसभा के नवनिर्वाचित विधायकों को वित्तीय कार्य और बजटीय प्रक्रिया (Budgetary Process) पर गहन मार्गदर्शन दिया। लोकसभा सचिवालय के पार्लियामेंटरी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसीज (PRIDE) और पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राष्ट्रीय प्रबोधन कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि लोकधन पर विधायिका का प्रभावी नियंत्रण ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री देवनानी ने साफ शब्दों में कहा कि बजट सिर्फ आय-व्यय का हिसाब-किताब नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, पारदर्शिता और लोककल्याण का संवैधानिक संकल्प है। उन्होंने बताया कि संविधान निर्माताओं ने ऐसी मजबूत व्यवस्था बनाई है कि सदन की मंजूरी के बिना न तो सरकार कोई पैसा खर्च कर सकती है और न ही जनता पर नया टैक्स लगा सकती है।

खास बात यह रही कि उन्होंने बजट पर होने वाली बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की जगह गंभीर लोकतांत्रिक विमर्श बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने विभाग संबद्ध स्थायी समितियों (Standing Committees) को कार्यपालिका की वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने का सबसे कारगर हथियार बताते हुए, जिन राज्यों में ऐसी समितियां नहीं हैं, वहां भी इनके गठन पर जोर दिया।

राजस्थान की सर्वोत्तम परंपराओं का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि यहां बजट पर सामान्य चर्चा और अनुदान मांगों के लिए पर्याप्त समय दिया जाता है और पहली बार जीतकर आए विधायकों को भी पूरी भागीदारी मिलती है। जनलेखा समिति, प्राक्कलन समिति और राजकीय उपक्रम समिति जैसी व्यवस्थाएं सार्वजनिक धन के इस्तेमाल की गहन जांच करती हैं।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब श्री देवनानी ने वित्तीय स्वायत्तता (Financial Autonomy) का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जब कार्यपालिका खुद विधायिका के प्रति जवाबदेह है, तो विधानसभाओं का अपने खर्चों के लिए कार्यपालिका पर निर्भर रहना शक्ति पृथक्करण की भावना के खिलाफ है। उन्होंने बताया कि राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष को सालभर में 50 लाख रुपये तक के काम बिना पूर्व स्वीकृति के कराने का अधिकार पहले से हासिल है।

उन्होंने संसद और राज्य विधानसभाओं की तुलना करते हुए एक तीखी टिप्पणी भी की — संसद के बजटीय प्रस्तावों को पूरा सम्मान मिलता है, जबकि कई राज्यों में विधानसभाओं के प्रस्तावों में कार्यपालिका कटौती कर देती है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा बताते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सुधार की मांग की।

अंत में उन्होंने नवनिर्वाचित विधायकों से आह्वान किया कि वे बजट के आंकड़ों के पीछे छिपे जनकल्याण के मकसद को समझें और वित्तीय अनुशासन के जरिए लोकतंत्र को और मजबूत बनाएं।